भगवान भरोसे देश



भगवान भरोसे देश




Aug 07, 02:16 am

सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी बंगलों में अवैध कब्जों को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के नाकारापन पर जैसी निराशा जताई उससे शायद ही कोई असहमत हो। सरकारे वास्तव में नाकारा होती चली जा रही है। सरकारी बंगलों में अवैध कब्जे का मामला पिछले अनेक वर्षो से सिर्फ इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित है, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारे अपने न्यूनतम बुनियादी दायित्वों का निर्वहन करने के बजाय तरह-तरह के बहाने बनाने में लगी हुई है। यद्यपि उनके ऐसे रवैये के लिए उन्हे स्वयं सर्वोच्च न्यायालय कई बार फटकार लगा चुका है, लेकिन उनके कान पर जूं तक नहीं रेगी। इन स्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय का निराश होकर यह कहना समझ में आता है कि इस देश की मदद भगवान भी नहीं कर सकते। नि:संदेह ऐसा नहीं है कि केंद्र और राज्य सरकारे केवल सरकारी बंगलों को अवैध कब्जों से मुक्त कराने में ही काहिली का परिचय दे रही हों। वे देश की आंतरिक सुरक्षा की रक्षा करने के मामले में भी ठीक ऐसा ही कर रही है। आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके संगठन स्टूडेट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया अर्थात सिमी जिस तरह पुख्ता सबूतों के अभाव में पाबंदी से मुक्त हो गया उससे तो सिर्फ और सिर्फ यही साबित होता है कि जिन पर देश की सुरक्षा का भार है वे हाथ पर हाथ धरे बैठे है। जिस संगठन के सदस्यों की देश भर में धरपकड़ हो रही हो और जिसके बारे में यह माना जाता हो कि वह आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने के साथ भारत को क्षति पहुंचाने वाली विदेशी ताकतों से मिला हुआ है उसके खिलाफ कोई सबूत न इकट्ठा किया जाना तो अक्षम्य अपराध है। आखिर इस अपराध के लिए कौन उत्तारदायी है? यह इतना गंभीर मामला है कि यदि इसके लिए केंद्रीय गृहमंत्री को बर्खास्त भी कर दिया जाए तो वह एक कम कठोर कार्रवाई होगी।
यह ठीक है कि सिमी के संदर्भ में विशेष न्यायाधिकरण के फैसले से शर्मसार हुई केंद्र सरकार तत्काल प्रभाव से सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पहुंच गई, लेकिन इससे उसकी खामी पर पर्दा नहीं पड़ता। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष तमाम तरह के तर्क प्रस्तुत करते हुए यह भी कहा है कि सिमी को पाबंदी से मुक्त करने वाले न्यायाधिकरण ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि इस संगठन के अनेक कार्यकर्ता अभी भी सांप्रदायिक और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त है। नि:संदेह ऐसा ही है, लेकिन आखिर वे सबूत कहां है जो केंद्र सरकार अपने तर्को के पक्ष में पेश कर सके? यदि सिमी जैसे खतरनाक संगठन के खिलाफ सबूत जुटाने की जरूरत नहीं समझी जा रही है तो फिर राष्ट्र इस पर यकीन कैसे कर ले कि अन्य देश विरोधी तत्वों के खिलाफ कोई कदम उठाए जा रहे है? वैसे तो ऐसे एक नहीं दर्जनों मामले है जो सरकारों की नाकामी की कहानी कह रहे है, लेकिन अब यदि संकीर्ण स्वार्थो को साधने के फेर में आंतरिक सुरक्षा को भी ताक पर रख दिया गया है तो वह दिन दूर नहीं जब कोई इस निष्कर्ष पर भी पहुंचेगा कि इस देश का भगवान ही मालिक है। सरकारी बंगलों में अवैध कब्जों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की निराशा और सिमी के संदर्भ में न्यायाधिकरण का निर्णय यदि कुछ बता रहा है तो यही कि राजनेताओं ने अपने निजी हितों की रक्षा के आगे सब कुछ भुला दिया है।

No comments:

Powered by Blogger.