Acharya Vinoba Bhave
आचार्य विनोबा भावे की मां सहृदय और दयालु थीं। वह शुरू से ही विनोबा जी को अच्छी शिक्षा व संस्कार देने में जुटी थीं। विनोबा जी भी बचपन में अन्य बच्चों की तरह ही शरारती थे। एक दिन विनोबा जी की पड़ोसिन को किसी जरूरी काम से बाहर जाना पड़ा। उस पड़ोसिन का भी एक छोटा बच्चा था। वह बच्चे को उस स्थान पर नहीं ले जा सकतीथी। इसलिए उसके सामने समस्या आ खड़ी हुई कि बच्चे को कहां पर छोड़े ?
जब यह बात विनोबा जी की मां को मालूम हुई तो उन्होंने बच्चे को अपने यहां छोड़ने के लिए कहा। पड़ोसिन को विनोबा जी की मां के सरल हृदय , ममता वप्रेम पर पूरा विश्वास था। इसलिए वह बच्चे को उनके पास छोड़कर चली गई। बच्चा विनोबाजी के साथ खेलने में मस्त हो गया। एक मां का समान स्नेह औरसद्भाव दोनों बच्चों पर बराबर रहा। जब खाने का समय हुआ और मां भोजन पकाकरदोनों बालकों को देने लगी तो विनोबाजी को अपनी मां के स्वभाव में कुछ अंतर नजर आया । उन्होंने देखा कि मां उन्हें सूखी रोटियां दे रही हैं जबकि पड़ोसी बालक को घी से चुपड़कर रोटियां अपने हाथों से खिला रही हैं।
यह देखकर वह मां से बोले , ' तुम मेरी मां हो लेकिन तुम मुझे तो सूखी रोटियां दे रही हो और इसे घी की रोटियां दे रही हो। आखिर ऐसा भेदभाव क्यों ?'
विनोबा जी की बात सुनकर मां बोलीं , ' बेटा , घर में इतना घी नहीं कि दोनों को दे सकूं। तू तो मेरा बालक है। पर यह तो भगवान का बच्चा है। अतिथि को भगवान कहते हैं। इसलिए भगवान के बच्चे में और अपने बच्चे में कुछ तो अंतर होना ही चाहिए। हमें कष्ट सहकर भी अतिथि को सुख देना चाहिए। '
मां की भावना विनोबा जी समझ गए और इस प्रकार बचपन से ही उनके व्यक्तित्व में श्रेष्ठ संस्कारों और सद्विचारों का समावेश हो गया।
जब यह बात विनोबा जी की मां को मालूम हुई तो उन्होंने बच्चे को अपने यहां छोड़ने के लिए कहा। पड़ोसिन को विनोबा जी की मां के सरल हृदय , ममता वप्रेम पर पूरा विश्वास था। इसलिए वह बच्चे को उनके पास छोड़कर चली गई। बच्चा विनोबाजी के साथ खेलने में मस्त हो गया। एक मां का समान स्नेह औरसद्भाव दोनों बच्चों पर बराबर रहा। जब खाने का समय हुआ और मां भोजन पकाकरदोनों बालकों को देने लगी तो विनोबाजी को अपनी मां के स्वभाव में कुछ अंतर नजर आया । उन्होंने देखा कि मां उन्हें सूखी रोटियां दे रही हैं जबकि पड़ोसी बालक को घी से चुपड़कर रोटियां अपने हाथों से खिला रही हैं।
यह देखकर वह मां से बोले , ' तुम मेरी मां हो लेकिन तुम मुझे तो सूखी रोटियां दे रही हो और इसे घी की रोटियां दे रही हो। आखिर ऐसा भेदभाव क्यों ?'
विनोबा जी की बात सुनकर मां बोलीं , ' बेटा , घर में इतना घी नहीं कि दोनों को दे सकूं। तू तो मेरा बालक है। पर यह तो भगवान का बच्चा है। अतिथि को भगवान कहते हैं। इसलिए भगवान के बच्चे में और अपने बच्चे में कुछ तो अंतर होना ही चाहिए। हमें कष्ट सहकर भी अतिथि को सुख देना चाहिए। '
मां की भावना विनोबा जी समझ गए और इस प्रकार बचपन से ही उनके व्यक्तित्व में श्रेष्ठ संस्कारों और सद्विचारों का समावेश हो गया।
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